ये कैसा न्याय है ?
रोटी कपड़ा और मकान, चाहे गरीब हो या धनवान. कहते हैं- जीने के लिए ये तीन चीजें जरूरी हैं !

शुरुआत
हम रोटी से करें तो बात किसानों से शुरू होती है देश के ज्यादातर किसान
केवल अपना कर्ज चुकाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा देते हैं और जब वो एकदम
थक जाते हैं या या इस दुनिया से हीं चले जाते हैं तो उत्तराधिकार में
सुपुत्र उस जिम्मेदारी का पालन करता है. ऐसे में जब परवरिश होती है एक
बच्चे की तो क्या हालात होते है देखिये-
५ साल का बच्चा अपनी माँ से – मम्मी सब लड़िकन क स्कूल में नाम लिखा गयल,
हमार नो लिखाई का. माँ बेटे से – नहीं बेटा इस बार तोहर नाम लिखाई स्कूल
में हम तोहके खेत में हल न चलावे देब तोहके, पढ़ा लिखा के एक बहुत बड़ा डाक्टर बनाईब तोहके. बच्चा – केतना बड़ा बाबाजी के जेतना बड़ा, माँ – नहीं ओनसे भी बड़ा डॉक्टर
बड़ा बड़ा ऑपरेशन करे वाला बड़ा साहब बनाईब तोहके कल ही तोहरे पापा के साथ
भेज के स्कूल में तोहार नाम लिखवाईब और नया ड्रेस, टाई, जूता मोजा बैग
थर्मस टिफिन किताब कापी पेंसिल क डब्बा, पेंसिल मितौना भी दिल्वाईब, इतना
सुनते हीं बच्चा बहुत खुश हो गया , क्यूंकि उसके पड़ोस के बच्चे केवल
सीमेंट की बोरी (बैठने के लिए), सीमेंट की ही बोरी का झोला और स्लेट चाक ले
कर पढ़ने जाते थे. माँ पिता से (घर का मुखिया) से बोली – “सुनत हया छोटू क
पापा कल जा के छोटू का नाम बढियां वाले स्कूल में लिखवा दा. पिता – ठीक ह
लिखवा देब. माँ नहीं अब ऐसे न चली आज कल करत करत २ साल बिट गयल. पिता ठीक ह
कल चल जाब नाम लिखवावे.

अगले
दिन सुबह सवेरे छोटू जी पांच बजे से ही स्कूल की तयारी में जुट गए और घर
वालों कर दिया हैरान और परेशां , मामी हमर नया वाला कपड़ा निकल डा बक्से में
से आज हम जूता मोजा भी पहिनब. अब छोटू जी को उनकी माँ ने स्कूल के लिए
तैयार किया. छोटू जी स्कूल का वक्त होने का इन्तेजार करने लगे. समय होने पर
पिता जी उन्हें लेकर स्कूल गए, लेकिन स्कूल पहुँचते हीं छोटू के सपने
धरासायी हो गए, ये वो स्कूल नहीं था जिसके लिए उसे इन्तेजार करना पड़ा था.
पापा ने कहा घबरा मत दो तिन दिन में ही बढियां वाले स्कूल में ले चलब, छोटू
जी इसी बात पर स्कूल में रुकने को मान गए. स्कूल का पहला दिन छोटू जी ने
बिताया और घर पहुंचे माँ ने पूछा तो उन्होंने सारा हल कह सुनाया तब
उन्होंने छोटू के पिता जी से पूछा क्या हुआ, पिता जी ने बताया - उ स्कूल
में ५७५ रु चाही तब एडमिशन होई. माँ ने एक बार बच्चे की तरफ देखा वो डबडबाई
हुई आँखों में शिकायत लिए उसे ही देख रहा था माँ को अपनी तरफ देखता पाकर
वो जाकर उससे लिपट गया और फूट फूट के रोने लगा. छोटू की माँ आखों में आंसू
और गोद में बच्चे को लिए हुए बडबडाने लगी - गबरा मत लाल हम तोहे जरूर पढाईब
बैग थर्मस भी दिलावाईब. उन्होंने छोटू के पिताजी की तरफ देखा वो अपने गमछे
से अपनी आँखें पोछते हुए घर से बाहर चले गए.
क्रमशः ....
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