युवा ही देश को बदल सकते हैं. "हम क्या कर सकते हैं ? " इस सोच की जगह हमें क्या करना चाहिए ये सोचें. हम अपना घर दुकान फैक्ट्री चला सकते हैं, क्या अपना देश नहीं चला सकते. हम सब इसके वारिस हैं. हमें इसे लावारिस छोड़ने का कोई हक नहीं है. (परिवार >>शहर/गांव>>प्रदेश >>देश).
मंगलवार, अक्टूबर 18, 2011
हम क्या कर सकते हैं ?
ये कैसा न्याय है ?
ये कैसा न्याय है ?
रोटी कपड़ा और मकान, चाहे गरीब हो या धनवान. कहते हैं- जीने के लिए ये तीन चीजें जरूरी हैं !
५ साल का बच्चा अपनी माँ से – मम्मी सब लड़िकन क स्कूल में नाम लिखा गयल, हमार नो लिखाई का. माँ बेटे से – नहीं बेटा इस बार तोहर नाम लिखाई स्कूल में हम तोहके खेत में हल न चलावे देब तोहके, पढ़ा लिखा के एक बहुत बड़ा डाक्टर बनाईब तोहके. बच्चा – केतना बड़ा बाबाजी के जेतना बड़ा, माँ – नहीं ओनसे भी बड़ा डॉक्टर बड़ा बड़ा ऑपरेशन करे वाला बड़ा साहब बनाईब तोहके कल ही तोहरे पापा के साथ भेज के स्कूल में तोहार नाम लिखवाईब और नया ड्रेस, टाई, जूता मोजा बैग थर्मस टिफिन किताब कापी पेंसिल क डब्बा, पेंसिल मितौना भी दिल्वाईब, इतना सुनते हीं बच्चा बहुत खुश हो गया , क्यूंकि उसके पड़ोस के बच्चे केवल सीमेंट की बोरी (बैठने के लिए), सीमेंट की ही बोरी का झोला और स्लेट चाक ले कर पढ़ने जाते थे. माँ पिता से (घर का मुखिया) से बोली – “सुनत हया छोटू क पापा कल जा के छोटू का नाम बढियां वाले स्कूल में लिखवा दा. पिता – ठीक ह लिखवा देब. माँ नहीं अब ऐसे न चली आज कल करत करत २ साल बिट गयल. पिता ठीक ह कल चल जाब नाम लिखवावे.
क्रमशः ....
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